आरक्षण भस्मासुर बना गया है। इसकी रचना करने वाले आम्बेडकर आज जीवित होते तो इसके घोर विरोधी होते तथा इसको समाप्त करने के आन्दोलन का नेतृत्व करते। राजस्थान इसकी दाहकता से ज्वलित हो चुका है। प्रंचडता का अनुभव कर चुका है। आरक्षण का हवन कुण्ड कई लोगों की बलि ले चुका है। करोडांे रूपयों की राष्ट्रीय क्षति हो चुकी है। मण्डल, आर्थिक, पिछडा वर्ग, अल्प संख्यक, गुर्जर, जाट, ब्राह्मण सभी की अपनी-अपनी मांग है। राजनेताओं ने इसे वोट खरिदने का हथियार बन चुका है। यह एक ढंग से ए.टी.एम. है। अर्थात् कार्ड खेलों, पासवर्ड दबाओं, वोट निकालों। यह एस.टी.एम. 58 सालों में घातक बन चुका है। विस्फोट की तैयारी है।
अभी गुर्जर आन्दोलन के समय भाजपा के एक वरिष्ठ विधायक से पूछा तो उन्होने कहा कि मजा आ रहा है। इससे हमारी नेतृत्व परिवर्तन की मांग पूरी हो जायेगी। किसी ने कहा कि हिन्दू मर गए। इस प्रकार हर समय आरक्षण किसी न किसी का बलिदान लेकर ही चला है।
आज आरक्षण पर समग्र रूप से व्यापक चिन्तन का समय आ चुका है। इसके स्वरूप पर राष्ट्रीय बहस का समय का चुका है। अभी गुर्जर आरक्षण आन्दोलन की आग में जब राजस्थान तप रहा था। उस समय सबसे अधिक आश्चर्य मुझे पूज्य संत रविशंकर महाराज के वक्तव्य पर हुआ कि वे भी यह कह बेठे कि गुर्जरों की मांग उचित है, परन्तु क्यों? वस्तुतः आरक्षण जिनको नहीं मिला, वे इसको हर हालत में प्राप्त करना चाहते है। जिनको मिल गया वे सब पिढीयों तक इसे अपने तक सिमित रखना चाहते है। आरक्षण पर उच्चतम न्यायालय का राइडर 50 प्रतिशत है। उच्चतम न्यायालय के राइडर को कई प्रान्तों ने तोड दिया, उसे संविधान संशोधन कर समर्थन दिया गया। वैसे सभी नेताओं का शगल बयानबाजी होता है। इससे कोई अछूता नहीं है।
आरक्षण देने का आधार सामाजिक भेदभाव, आर्थिक पिछडापन तथा इससे उत्पन्न होती विषमता, हीन भावना, कमजोरी था। इस प्रकार के सभी वर्गो में विभिन्न श्रेणिया बनाकर जोडा गया था। आज यदि आरक्षण की मांग उठती है तो सभी दलों, अर्थ शास्तियों एवं अन्य का यह दावा झूठा है कि देश प्रगति कर रहा है। विकास हो रहा है। हम आगे बढ रहे है। वास्तव में ऐसा होता है तो आरक्षण से स्वतः लोग दूर जाते, इसे समाप्त करने की मांग करते। जबकि सारा कुछ इसके विपरित हो रहा है। आरक्षण आन्दोलनों में किसी भी दल का नैतृत्व निकम्मा तथा नकारा हो जाता है। आरक्षण आन्दोलनों से जो कुछ उभरा है वह इतना भयावह है कि डर लगता है। बडे विशाल जाति समूह एक विद्रोही का रूप अख्तियार करे। बसे जलावे, रेल ट्रेक तोडे, 10-15 दिन तक शव रखे रहे, आत्मदाह हो जाये, धमकिया दी जावे। यह सब अलोकतान्त्रिक उपाय होते है। विशाल जाति समूह की दबाव राजनीति के सामने सरकारे, सत्ता-पुलिस लाचार होती है। न्याय प्रियता, अन्य का सुख चैन, जीवन का अधिकार इस कथित बहुमती विद्रोह, तानाशाही या अदैवीय कृत्य से खो जाता है। रक्षक मौन है। भक्षक कृत्य से सक्रिय है। अब गलत काम का पुरस्कार भी है। साहयता है। कैसे-कैसे मानदण्ड, नौकरी भी है। कानून की अवज्ञा हिसंक ढंग से करो, अराजकता उत्पन्न करो, उसके रक्षक होने का दावा करो।
सरकारे भी झुकती है। वोट की ताकत ऐसी है कि भारत मां को डायन कहने वाले, उच्चतम न्यायालय की अवमानना करने वाले मंत्री बनते है। इस देश में इसी प्रकार रावणीवृति का गुणगान होता है। उसकी प्रशस्ति होकर महिमा मण्डन किया जाता है। कंस को सहारा जाता है। तब बिचारे हिटलर-मुसोलीनी, ओसामा बिन लादेन को आपराधी क्यों करे।
आज के आरक्षण आन्दोलन, आरक्षण से ही उत्पन्न सामाजिक राजनीतिक तथा आर्थिक विषमता की उपज है। इस पर समाज विज्ञान की दृष्टि से गंभीर विचार की आवश्यकता है।
जाटों के आरक्षण से राजपूत उद्वेलित क्यों हुआ? गुर्जरों ने एस.टी. आरक्षण की मांग क्यांे की? इसके मूल में सरकारी नौकरी की बजाय राजनैतिक पद पाने की लालसा ज्यादा है। आरक्षण के आधार पर सरपंच, प्रधान, प्रमुख आदि के पद जब मिल जाते है तो उसको लेकर विवाद भी होते है। विवाद का मूल कारण बढता हुआ जातिवाद है। जातिवाद के आधार पर पनपता पक्षपात है। भाई-भतीजा वाद है। जिस कारण बार-बार विरोध होता है।
आरक्षण ने योग्यता का गला घोटा है। आरक्षण पर पुनर्विचार करने का अब समय आ गया है। सवाल यह उठता है कि क्या मायावती, रामविलास पासवान, रामदास आठवाले को आरक्षण की क्या जरूरत है। इसी तरफ से लालू प्रसाद यादव मूलायमसिंह यादव, नितीष कुमार, सुषील कुमार मोदी को आरक्षण की क्या आवष्यकता है। जो लोग आरक्षण का लाभ लेकर आयकर देने की स्थिति में आ गये है। उन सब लोगांे से यह लाभ छिन जाना चाहिए। राजस्थान में एस.टी. के आरक्षण का लाभ जिस समुदाय को मिलना चाहिए था वह सिरोही, डूंगरपुर, बांसवाडा, चित्तौड, प्रतापगढ़ के समुदाय के लोग आज भी अत्यंत गरीबी की हालत में है। पिछडे है। षिक्षा के पर्याप्त साधन नहीं है। आरक्षण का लाभ जिस मीना समाज ने प्राप्त किया। वे सभी लोग जागीरदार मीना रहे है। इस कारण से प्रारम्भ से ही इनमें षिक्षा का स्तर ठीक था। फिर आरक्षण का साथ मिल गया। लोग आगे बढ गये। इसी क्षैत्र में इसी तरह के सामाजिक आधार वाला गुर्जर समाज आरक्षण का लाभ नहीं मिलने से साठ साल में अपने समान समाज से पिछड गया। यही विवाद की जड़ है। आरक्षण अब सामाजिक समरसता का वाहक नहीं होकर अब समाज में विषमता उत्पन्न करने में कारण बन रहा है। सभी लोग मिलकर टूटते समाज को बचाने के लिए इस पर चिन्तन करे।
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शनिवार, 11 अप्रैल 2009
रविवार, 29 मार्च 2009
वरूण गांधी बनाम धर्म निरपेक्षता
गत कुछ दिनों से टीवी तथा अन्य मिडिया साधनों में संजय गांधी के पुत्र वरूण गांधी का नाम चर्चा में है। अभी वरूण गांधी न्यायालय के आदेष से जेल में है। उन पर किसी जाति विषेष पर या मत विषेष पर टिप्पणी करने का आरोप है। यह भी आरोप है कि ऐसा करके उन्होने दो मतों में विद्वेष का भाव उत्पन्न किया। वरूण गांधी के जेल भेजे जाने पर मुझे राज ठाकरे का भाषण, व्यवहार तथा उनकी तुरंत होती जमानते याद आ गयी। वरूण गांधी न्यायालय के आदेष से जेल में है। न्यायालय किसी की जमानत लेने अथवा नहीं लेने का अधिकार रखता है। इस पर कोई टिप्पणी नहीं करते हुये तथा न्यायालय के प्रति सम्मान करते हुये राज ठाकरे तथा वरूण गांधी की टिप्पणियों में भेद खोजने का निरर्थक प्रयास करता रहा।
कांग्रेस वरूण गांधी की टिप्पणी से बहुत अधिक आहत है। ऐसा होना स्वाभाविक है। कांग्रेस उत्तर प्रदेष में अपना आधार खो चुकी है। कांगे्रस के नेता या युवराज राहुल गांधी कांगे्रस के लगातार सिमटते आधार को बचाने में असफल से नजर आते है। ऐसे में भारतीय जनता पार्टी में गांधी नेहरू परिवार का व्यक्ति नेता बनकर उभर जाये और उसे सभी लोग बधाई देने लगे। मिडिया सकारात्मक या नकारात्मक किसी भी रूप में उसका नाम बार-बार दोहराये तथा बार-बार उसका लाल रंग का कुर्ता पहना हुआ लम्बा तिलक लगा हुआ जय श्री राम का उद्घोष करता हुआ फोटो बताये तथा उसके पीछे नारें को लगाती भीड़ बताये तो कांगे्रस में दर्द होना स्वाभाविक है। मुझे यह दर्द समझ में नहीं आता। वरूण गांधी भाजपा के नेता है भाजपा की भाषा बोलेगें। वैसे भी कांगे्रस के पास उत्तर प्रदेष में गवाने के लिए क्या बचा है। कांगे्रस की समस्या यह है कि नेहरू गांधी परिवार की जिस विरासत के नाम पर वह अभी तक कुछ वोट जुटाती आयी है वह वोट कही भाजपा के साथ वरूण गांधी नहीं ले जाये। इन्दिरा गांधी के पौतेे के रूप में राहुल गांधी की जगह वरूण गांधी प्रोजेक्ट नहीं हो जाये। ऐसा हो गया तो कांग्रेस की नानी मर जायेगी।
वरूण गांधी ने कुछ गलत कहा है क्या? जिसे सुनकर चुनाव आयोग ने भाजपा को उन्हे उम्मीदवार न बनाने की सलाह दे दी। चुनाव आयोग की यह सलाह उसके क्षैत्राधिकार का अतिक्रमण है। चुनाव आयोग के कानून में किसी उम्मीदवार का नामांकन रद्द करने का अधिकार अवष्य है। वह भी उन हालात में जब वह निर्धारित योग्यता की पूर्ति नहीं करता हो। चुनाव आयोग ने भारत माता को डायन कहने वाले एक नेता के बारे में तो ऐसी सलाह नहीं दी। इसके अलावा हिन्दुओं के बारे में मनचाही अनर्गल टिप्पणी करने वाले लोगों पर कार्यवाही करने से सरकारे बचती रहती है। आतंकवादी विरोधी कठोर कानून एक मत विषेष के विरोध में नजर आते है। कष्मीरी पंडित कितने वर्षों से पीडित है। उनकी चिंता करना लाल झण्डे तथा कांग्रेस के लोगों को याद नहीं आता है। वरूण गांधी इस देष में खडे होकर यदि यह कहते है कि हिन्दु की तरफ उठने वाला हाथ काट दिया जायेगा तो क्या गलत है? यदि वह तालीबानी मानसिकता को लेकर कठोर टिप्पणी करते है तो क्या गलत करते है? मुझे कही बार लगता है कि आपातकाल में जिस ढंग से संजय गांधी को कुछ समझ में आया था। वैसा ही यह उनका पुत्र धीरे-धीरे समझ रहा है।
वरूण गांधी कष्मीरी पंडित गंगाधर नहर वाले के परिवार के है। भाजपा उनका यह परिचय देते हुये उनको कष्मीर में चुनाव प्रचार के लिए भेज सकती है। भारतीय राजनीति में युवा वरूण गांधी ने ष्ष्यामाप्रसाद मुखर्जी के बाद जो शंख नाद किया है वह स्वागत योग्य है। आज कष्मीर जैसा भी बचा है उसका धन्यवाद डाॅ मुखर्जी को है।
आने वाले चुनाव में भाजपा को स्पष्ट रूप से राष्ट्र हितों को सामने रखते हुये प्रचार करना चाहिए। उडीसा में यदि भाजपा अपने बुते पर सारी सीटों पर चुनाव लडती है तो फायदे में रहेगी। चुनाव परिणाम इसको स्पष्ट करेगें। मिडिया द्वारा वरूण गांधी का प्रचार करने से भाजपा को नरेन्द्र मोदी के बाद एक स्टार प्रचारक और मिल गया। तत्काल जमानत करवाकर पूरे देष में जय श्री राम का उद्घोष करते वरूण गांधी को भेजा जावे।
कांग्रेस वरूण गांधी की टिप्पणी से बहुत अधिक आहत है। ऐसा होना स्वाभाविक है। कांग्रेस उत्तर प्रदेष में अपना आधार खो चुकी है। कांगे्रस के नेता या युवराज राहुल गांधी कांगे्रस के लगातार सिमटते आधार को बचाने में असफल से नजर आते है। ऐसे में भारतीय जनता पार्टी में गांधी नेहरू परिवार का व्यक्ति नेता बनकर उभर जाये और उसे सभी लोग बधाई देने लगे। मिडिया सकारात्मक या नकारात्मक किसी भी रूप में उसका नाम बार-बार दोहराये तथा बार-बार उसका लाल रंग का कुर्ता पहना हुआ लम्बा तिलक लगा हुआ जय श्री राम का उद्घोष करता हुआ फोटो बताये तथा उसके पीछे नारें को लगाती भीड़ बताये तो कांगे्रस में दर्द होना स्वाभाविक है। मुझे यह दर्द समझ में नहीं आता। वरूण गांधी भाजपा के नेता है भाजपा की भाषा बोलेगें। वैसे भी कांगे्रस के पास उत्तर प्रदेष में गवाने के लिए क्या बचा है। कांगे्रस की समस्या यह है कि नेहरू गांधी परिवार की जिस विरासत के नाम पर वह अभी तक कुछ वोट जुटाती आयी है वह वोट कही भाजपा के साथ वरूण गांधी नहीं ले जाये। इन्दिरा गांधी के पौतेे के रूप में राहुल गांधी की जगह वरूण गांधी प्रोजेक्ट नहीं हो जाये। ऐसा हो गया तो कांग्रेस की नानी मर जायेगी।
वरूण गांधी ने कुछ गलत कहा है क्या? जिसे सुनकर चुनाव आयोग ने भाजपा को उन्हे उम्मीदवार न बनाने की सलाह दे दी। चुनाव आयोग की यह सलाह उसके क्षैत्राधिकार का अतिक्रमण है। चुनाव आयोग के कानून में किसी उम्मीदवार का नामांकन रद्द करने का अधिकार अवष्य है। वह भी उन हालात में जब वह निर्धारित योग्यता की पूर्ति नहीं करता हो। चुनाव आयोग ने भारत माता को डायन कहने वाले एक नेता के बारे में तो ऐसी सलाह नहीं दी। इसके अलावा हिन्दुओं के बारे में मनचाही अनर्गल टिप्पणी करने वाले लोगों पर कार्यवाही करने से सरकारे बचती रहती है। आतंकवादी विरोधी कठोर कानून एक मत विषेष के विरोध में नजर आते है। कष्मीरी पंडित कितने वर्षों से पीडित है। उनकी चिंता करना लाल झण्डे तथा कांग्रेस के लोगों को याद नहीं आता है। वरूण गांधी इस देष में खडे होकर यदि यह कहते है कि हिन्दु की तरफ उठने वाला हाथ काट दिया जायेगा तो क्या गलत है? यदि वह तालीबानी मानसिकता को लेकर कठोर टिप्पणी करते है तो क्या गलत करते है? मुझे कही बार लगता है कि आपातकाल में जिस ढंग से संजय गांधी को कुछ समझ में आया था। वैसा ही यह उनका पुत्र धीरे-धीरे समझ रहा है।
वरूण गांधी कष्मीरी पंडित गंगाधर नहर वाले के परिवार के है। भाजपा उनका यह परिचय देते हुये उनको कष्मीर में चुनाव प्रचार के लिए भेज सकती है। भारतीय राजनीति में युवा वरूण गांधी ने ष्ष्यामाप्रसाद मुखर्जी के बाद जो शंख नाद किया है वह स्वागत योग्य है। आज कष्मीर जैसा भी बचा है उसका धन्यवाद डाॅ मुखर्जी को है।
आने वाले चुनाव में भाजपा को स्पष्ट रूप से राष्ट्र हितों को सामने रखते हुये प्रचार करना चाहिए। उडीसा में यदि भाजपा अपने बुते पर सारी सीटों पर चुनाव लडती है तो फायदे में रहेगी। चुनाव परिणाम इसको स्पष्ट करेगें। मिडिया द्वारा वरूण गांधी का प्रचार करने से भाजपा को नरेन्द्र मोदी के बाद एक स्टार प्रचारक और मिल गया। तत्काल जमानत करवाकर पूरे देष में जय श्री राम का उद्घोष करते वरूण गांधी को भेजा जावे।
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