शनिवार, 16 मई 2009

जालोर का इतिहास

जालोर के इतिहास प्रसि) वीर यो)ा वीरमदेव का जन्म किस सन् सम्वत् में हुआ तथा किस तिथि वार को हुआ, इस विषय में इतिहास मौन है। “वीरमदेव सोनीÛरा री बात” और “मुंहता नै.ासी री ख्यात” दोनों इस विषय में मौन है। इस कार.ा से वीरमदेव का जन्म कब हुआ, यह कहना आज कठिन है। इतिहास के विद्यार्थियों के लि, यह प्रश्न है। चैहान वंश की जन्मÛाथा लिखने वाले तथा चैहान कुल कल्पद्रुम के लेखक लल्लु भाई देसाई ने भी इस विषय में असफलता ही प्राप्त की है। जालोर के चैहान नाडोल से जालोर आये थे। राव लाख.ासी जिसे लाख.ासी भी कहा Ûया है, उसने नाडोल पर चैहान राज्य की स्थापना की थी। लाख.ासी का पु= आसरा हुआ, जो नाडोल का राजा हुआ। इसकी संतानों में सोनÛरा चैहान, वाव चैहान आदि कई खांपें(Ûो=) बतलायी Ûयी है। लाख.ासी सांभर से आया था। इसी लाख.ासी के परिवार में कीतू अथवा कीर्तिपाल का जन्म हुआ। उस कीतू ने नाडोल से अलÛ होकर जालोर में अपना राज्य स्थापित किया। कीतू अथवा कीर्तिपाल के पु= का नाम समरसिंह था। कीतू को शुरूआत में नारलाई के 12 Ûांवों की जाÛीर मिली थी, परन्तु उसने अपने पराक्रम से जालोर के तथा कीराडु के परमार राजाओं को पराजित कर अपना अलÛ राज्य स्थापित किया। कीतू ने अपना राज्य स्र्व.ाÛिरी पहाड़ पर अथवा सोनÛरा पहाड पर स्थापित किया, इस कार.ा से कीतू के वंशज सोनÛरे चैहान कहलाये। कीतू ने जालोर के परमार राजा कुंतपाल, सिवा.ाा के राजा वीरनाराय.ा आदि को पराजित किया। कीतू का बेटा समरसिंह हुआ। समरसिंह का बेटा मुंहता नै.ासी री ख्यात के मुताबिक अरीसिंह हुआ। अरीसिंह का पु= उदयसिंह हुआ। जिसके उपर अलाउदीन खिलजी के चाचा जलालुदीन खिलजी ने सम्वत् 1298 की मा?ा सुदी पांचम को हमला किया था। उदयसिंह ने उस हमले का जोरदार जवाब दिया और जलालुदीन खिलजी को जालोर से भाÛना पड़ा। उस अवसर पर खुंदाकाचड ने ,क दोहा कहा था जो निम्न प्रकार है - “सुंदरसर असुरह दले जलपीयो वे.ोह, ऊदे नरपद काढीयो तस नारी नय.ोह” इस उदयसिंह का पु= जसवीर हुआ। जसवीर का बेटा करमसी हुआ और करमसी का बेटा चाचींÛदेव हुआ, जिसने संुधा के पहाड़ पर मन्दिर बनाया। इसके अलावा सेवाड़ा के पातालेश्वर मन्दिर को भी उसने बनाया। उस मन्दिर में ,क शिलालेख इस विषय में मिलता हैै, जिसमें चाचींÛदेव का उल्लेख है। सेवाड़ा का वह पातालेश्वर मन्दिर भी शिल्प की दृष्टि से अपने आप में अनूठी मिसाल है। उस शिलालेख के अनुसार सम्वत् 1308 में वैशाख वदी तीज को वहां निर्मा.ा प्रारम्भ किया Ûया था। इसी प्रकार से जसवंतपुरा के पास संवत् 1230 के ,क ख.िडत मन्दिर का उल्लेख मिलता है। ,ेसा कहा जाता है कि वह मन्दिर दशावतार का मन्दिर था। इस मन्दिर को कृष्.ा के इन्द्रप्रस्थ से }ारका जाने वाले मार्Û की स्मृति के रूप में बनाया Ûया था। चाचींÛदेव का पु= सामंतसिंह हुआ। सामंतसिंह के 5 पु= हु,, जिनके नाम कान्हडदेव, व.ावीर, सालजी, डरराव, Ûोकलीनाथ और मालदेव है जो सिरोही राज्य के राजपुरोहित की पुस्तक में लिखे हु, मिलते हैं जबकि सिरोही राज्य के इतिहास की पुस्तक में सांमतसिंह के दो पु=ों का नाम मिलता है, कान्हड़देव और मालदेव। कान्हड़देव के पु= का नाम वीरमदेव मिलता है। मालदेव के विषय में यह कहा जाता है कि वह कान्हड़देव का भाई था और इतिहास में मुछालामालदेव के नाम से प्रसि) हुआ। इस प्रकार का ?ाटनाक्रम इतिहास में मिलता है।

कीतू को जलन्धरनाथ योÛी ने पारसम.ाी दी थी और इस पारसम.ाी के आधार पर उसने जालोर के Ûढ को बंधवाया था। पारसम.ाी का उल्लेख कान्हड़देव प्रबन्ध में भी आता है कि कान्हड़देव ने पारसम.ाी को झालर बावडी में डाल दिया था। आज भी कई लोÛ पारसम.ाी की आशा में जालोर किले में भटकते रहते है। जालोर का किला कीतू }ारा 1232 में बंधवाया था। इस बात का उल्लेख चैहानों का भाट वजेचन्द अपनी पुस्तक में इस प्रकार से करता है - “बारासै बत्तीसे परठ जालोर प्रमा.ा, तें कीदि कीतू जिंद राव त.ाा Ûढ अडÛ चहुआ.ा-” कीर्तिपाल का देहान्त संवत् 1235 से 1239 के बीच किसी यु) में होना बताया जाता है। यह यु) भी मुसलमानों के साथ हुआ था। इसके पु= समरसिंह के विषय में यह जानकारी मिलती है कि कनकाचल अर्थात स्र्व.ाÛिरी पर उसने कोट बनाया था और इस कोट पर दूर-दूर तक Ûोले फेंकने वाले यं= लÛाये थे अर्थात तोपें समरसिंह ने लÛा दी थी। इसने समरपुर नामक ,क शहर भी बसाया था, जहां उसने सुन्दर बÛीचा लÛाया था। यह समरपुर क्या सुमेरÛढ खेड़ा है, जो बिबलसर के पास आया हुआ है। यह भी बताया जाता है कि इसने जालोर में दो शिव मन्दिर बनाये थे। इसकी बहिन रूदलदेवी का विवाह Ûुजरात के दूसरे राजा भीमदेव सोलंकी के साथ हुआ था, ,ेसा ,क शिलालेख जालोर की भोजकालीन परमार पाठशाला में लिखा Ûया है। जालोर के राजाओं को रावल की पदवी थी। इसी समरसिंह के पु= मानसिंह उर्फ मा.ाी ने सिरोही राज्य की स्थापना की। इसी समरसिंह के बड़े पु= उदयसिंह ने जालोर राज्य का विस्तार किया। उदयसिंह बड़ा पराक्रमी था। इसके राज्य में नाडोल, जालोर, म.डोर, बाड़मेर, सुराचन्द, राडहट, रामसी.ा, रतनपुर आदि कई {ौ= थे। उदयसिंह ने जालोर में दो शिवालय बनाये थे। ,क शिवालय सांडबाव के पास था, इसका नाम सिंधुराजेश्वर मन्दिर था। यह सिंधुराज को मारने की स्मृति में बनाया Ûया था। वर्तमान में इस स्थान पर पुलिस थाना, ,क दरÛाह, ,क व्यायाम शाला बनी हुई हैं। इस मन्दिर परिसर के चारों तरफ कोट था। मन्दिर के बाहर सिंधुराज की बाव सांडबाव थी। मन्दिर के चारों तरफ कोट होने से कोटेश्वर महादेव भी इसका नाम कहा Ûया हैं। आज भी इस स्थान पर खुदाई होने पर पुराने अवशेष मिलते हैं। जिसमें से कई जालोर के पुस्तकालय में सुर{िात रखे Ûये है। इसी स्थान से किसी समय विष्.ाु भÛवान तथा ल{मीजी की प्रतिमा भी निकली हुई है जो वर्तमान में सायरपोल के अन्दर स्थापित है। इसी उदयसिंह के }ारा दूसरा मन्दिर जाÛनाथ महादेव का बनाया Ûया था। इस सम्बन्ध में वहां पर टूटे फूटे शिलालेख आज भी मिलते हैं। उदयसिंह का पु= चाचींÛदेव बड़ा वीर था। इसने सुंधामाता का मन्दिर, सिरोही में मातरमाता का मन्दिर बनाया। चाचींÛदेव का पु= सामंतसिंह हुआ। जिसका पु= कान्हडदेव हुआ। विक्रम संवत् 1368 में जालोर का किला टूटा। इस बात का उल्लेख विक्रम संवत् 1545 में लिखे कान्हड़देव प्रबन्ध में मिलता है। कान्हड़देव ने बादशाही फौज को Ûुजरात में जाने का रास्ता नहीं दिया था। इससे नाराज होकर बादशाह अलाउदीन खिलजी ने जालोर के किले पर ?ोरा डाला और वीका दहिया नामक व्यक्ति को अपने प{ा में लोभ देकर मिला दिया। इसका र्व.ान करते हु, पदमनाभ कहता है -
“सेजवालि Ûढ कार.िा करी, पापी पापबु)ि आदरी।
लोभइ ,क विटालइ आप, लोभइ ,क करइ ?ा.ा पाप।।”
वीका दहिया }ारा किये Ûये इस विश्वास ?ाात को उसकी पत्नी हीरांदे ने अस्वीकार किया। हीरांदे ने जो काम किया वह इतिहास में स्र्व.ा अ{ारों में लिखने लायक है। हीरांदे ने अपने पति वीका को कहा कि चंडाल तू मुंह दिखाने लायक नहीं है, जिसने तेरे पर विश्वास किया, वह विश्वास तुमने भंÛ किया, मेरी सास के Ûर्भ से तेरे जÛह ,क जहरीले नाÛ का जन्म हुआ और इसी के साथ हीरांदे ने खडÛ उठाया और वीका का सिर काट दिया। काटे हु, सिर को र.ाचंडी की तरह हाथ में पकडऋ कर Ûढ के अन्दर भाÛ कर Ûयी। कान्हड़देव को सूचना की, कि वीका दहिया ने विश्वास ?ाात कर दिया है और उसी के साथ यु) का ,ेलान हुआ।

इस यु) में सोनÛरा चैहानों के साथ कान्धल देवड़ा, उलेछा कान्धल, ल{ाम.ा सोभात, जेता देवड़ा, लू.ाकर.ा, जेता वा?ोला, अर्जुन विहल, मान ल.ावाया, चांदा विहल, जेतपाल, राव सातल, सोमचन्द व्यास, सला राठौड़, सला सेवटा, जा.ा भ.डारी यु) मेें काम आये। 1584 महिलाओं ने जौहर(जमहर) किया। इस प्रकार वैशाख सुदी छठ संवत् 1368 को जालोर किले से चैहानों का शासन समाप्त हुआ।

जालोर का प्राचीन नाम जाबालीपुर भी है। जालोर व्यापारिक केन्द्र भी रहा है। यहां पर प्रतिहार वंश का शासन भी रहा है। किसी समय यह {ौ= सरस्वती नदी का प्रवाह प{ा {ौ= भी रहा है। जैनाचार्य कुशलसूरी ने यहां तपस्या भी की है।

जालोर पूरे भारतवर्ष में अनूठा स्थान है। अनूठा इसलि, है कि देशभर में जब विधर्मी शासन कर रहे थे, उस समय विभिन्न राज परिवारों से डोले दिल्ली भेजे Ûये थे, जबकि जालोर में दिल्ली से अलाउदीन खिलजी की पु=ी शहजादी फिरोजा का डोला वीरमदेव के साथ विवाह के प्रस्ताव के सहित आया था। उस प्रस्ताव में यह भी था कि Ûुजरात का राज्य देंÛे। नौ करोड़ स्र्व.ा मुद्रा,ं देंÛे। इसके बावजुद भी इस विवाह प्रस्ताव को बड़े Ûंभीर शब्दों में अस्वीकार किया Ûया है। इसे कुल का अपमान माना Ûया है। ,क दोहा भी कहा Ûया है -
“मामा लाजे भाटीयां कुल लाजे चहुवा.ा,
जे पर.ाीजंू तुरकडी, तो अवळो ऊÛे भा.ा।”
जालोर में तथा इस जिले में जो है, उसका र्व.ान सहज तथा सरल नहीं है। जालोर से 45 किलोमीटर की दूरी पर आपेश्वर महादेव का मन्दिर है। आपेश्वर की प्रतिमा विश्व की अपने आप में अनूठी प्रतिमा है। जिसे देखकर डाॅक्टर विष्.ाु श्रीधर वाक.ाकर आश्चर्य चकित हो Ûये थे। उनका कहना था कि यह अर्व.ानीय है। इसी प्रकार से भीनमाल में स्थित वाराहश्याम का मन्दिर तथा वाराहश्याम की प्रतिमा जो Ûुप्तकालीन बतायी जाती है, उसकी विशालता, उसका शिल्प शायद ही कहीं देखने को मिले। भीनमाल के आसपास वाराह के अनेक मन्दिर है। वाराह मन्दिर में ही Ûजल{मी की प्रतिमा है। इसके अलावा वामन अवतार की तथा पार्वती के भीलनी स्वरूप की भी प्रतिमा है। चंडीनाथ मन्दिर भीनमाल मेें कुबेर की प्रतिमा है। जालोर के पास चितहर.ाी में नाÛ चट्टानें है। पा.ावा Ûांव का नाम पा.ावा “पा.डवा” के आधार पर ही बना है। वहां पर ,क पुराना पा.ड्वेश्वर मन्दिर भी है। सिया.ाा Ûांव में 1000 वर्ष पुराना खेतलाजी({ौ=पाल) का मन्दिर है। बिबलसर Ûांव में प्राचीन कदम्ब का वृ{ा है। जिसके नीचे भÛवान कृष्.ा ने विश्राम किया हुआ है। सुभद्रा-अर्जुन के विवाह की स्मृति में भाद्राजून बसा है। सोमनाथ के शिवलिंÛ को मुक्त कराने की स्मृति में सरा.ाा Ûांव बसा है। इसी तरह से उसी मार्Û में नीलकंठ महादेव है, तो ,ेसरा.ाा के पहाड़ में सुरेश्वर महादेव है। Ûोलाना Ûांव के खंडहरों में दशावतार का मन्दिर है।

अपने प्रारम्भिक काल से ही जालौर में संस्कृति कला और धर्म फूलता-फलता रहा हैं हिन्दू शासन काल में यह साहित्य का भी ,क महत्वर्पू.ा केन्द्र बन चुका था। शैव ओर जैन, दोनों धर्मों की यहां र्पू.ा प्रतिष्ठा थी। उनके मन्दिर भी यहां बहुतायत में निर्मा.ा किये Ûये थे जो अधिकांशतः मुस्लिम आक्रम.ाों में विनष्ट हो चुके हैं। साहित्य और शिलालेख के विवर.ाों के अनुसार सिन्धु राजेश्वर मन्दिर का अस्तित्व बारहवीं शताब्दी के अन्तिम समय तक रहा। सन् 1117 ई- के शिलालेख से हमें यह जानकारी प्राप्त होती है, कि परमार शासक वीसल की पत्नी मल्लार देवी ने इस मन्दिर पर स्र्व.ा कलश अर्पित किया था। सम्राट समरसिंह देव(सन् 1182-1199 ई-) की बहन रूदलदेवी ने यहां दो भव्य शिव मन्दिर निर्मित करवाये थे। उसमें से ,क ‘{िाम्बरायेश्वर मन्दिर‘ का अस्तित्व तो सन् 1263 ई- तक था, जिसका मुख्य पुजारी रावल ल{मीधर था।

जैन मन्दिरों में प्रमुख आदिनाथ, महावीर, पाश्र्वनाथ और शान्तिनाथ के मन्दिर थे। इसमें संभवतः आदिनाथ का मन्दिर प्राचीनतम् था। इसका अस्तित्व आठवीं शताब्दी तक ज्ञात है, इसी मन्दिर के उपासरे में उद्योतनसूरि ने (सन् 778 ई-) अपनी प्रसि) रचना कुवलयमाला र्पू.ा की थी। समरसिंह के राजकाल में श्रीमाली बनियाॅं यशोवीर (सन् 1182 ई-) ने आदिनाथ मन्दिर का म.डल बनाया था।

दूसरा महत्वर्पू.ा मन्दिर पाश्र्वनाथ का था। यह चालुक्य सम्राट कुमार पाल के राजकाल (सन् 1164 ई-) में बना था। प्रसि) जैनाचार्य और कुमारपाल के Ûुरू हेमचन्द्र ने अपने हाथों से पाश्र्वनाथ विÛ्रह की प्रतिष्ठा की थी।

स्र्व.ाÛिरि दुर्Û स्थित इस मन्दिर का नाम कुमार विहार रखा Ûया था। इस मन्दिर का पुनःनिर्मा.ा महाराजा समरसिंह के आदेश से सन् 1185 ई- में भंडारी यशोवीर }ारा करवाया Ûया। सन् 1239 ई- के ,क शिलालेख से हमें सूचना मिलती है, कि नाÛौर के लाहेड़ने पाश्र्वनाथ के बÛल में आदिनाथ की ,क मूर्ति प्रतिष्ठित करवायी थी।

तीसरा महत्वर्पू.ा जिनालय महावीर का था, जिसे ‘चंदन विहार‘ के नाम से जाना जाता था, जो ना.ाकÛच्छ से सम्बन्धित था। तेरहवीं शताब्दी के महाकवि महेन्द्र सूरि ने अपनी ‘अष्ठोत्तरी तीर्थमाला‘ में इस मन्दिर का विस्तृत र्व.ान किया है। जैन अनुश्रुतियों में इसका निर्मा.ा म.डोर के प्रतिहार शासक नाहड़राव ने करवाया था। सन् 1263 ई- के ,क शिलालेख के अनुसार भट्टारक रावल ल{मीधर ने इस मन्दिर पर सौ द्रम दान में दिये थे। सन् 1224 ई- में जब जिनेश्वर सूरि जालौर पधारे थे तब उन्होंने यहां महोत्सव आयोजित किया था, तद्न्तर सन् 1253 ई- में ,क बार फिर वे जालौर पधारे थे, तब उन्होंने सम्राट उदयसिंह तथा उनके मं=िम.डल के सहयोÛियों की उपस्थिति में तीर्थंकर की मूर्ति प्रतिष्ठित की थी।

इसके अतिरिक्त तेरहवीं शताब्दी में शान्तिनाथ तथा अष्ठपाद के जैन मन्दिर भी विद्यमान थे। सम्राट चाचींÛ देव के राज्यकाल (सन् 1259 ई-) में पादसू और मुलिÛ ने शान्तिनाथ मन्दिर पर दो स्र्व.ा कलश अर्पित किये थे। लू.ावसही(आबू) के सन् 1259 के शिलालेख के अनुसार देवचन्द्र ने अष्ठापद मन्दिर के सम्मुख दो विस्तृत चैकियां स्थापित की थी। जिसका अस्तित्व सन् 1594 ई- तक ज्ञात होता है।

उपर्युक्त उ)र.ा से ज्ञात होता है कि प्राचीन काल से ही जालौर जैनधर्म के प्रमुख तीर्थ स्थल के रूप में मान्यता प्राप्त कर चुका था। सि)सेनसूरि अपनी ‘तीर्थमाला‘ में इसका पु.य स्मर.ा करते हैं। विधिचैत्य आन्दोलन को जालौर से ही शक्ति प्राप्त हुई थी। सन् 1168 ई- में प्रसि) खरतरÛच्छ आचार्य जिनचन्द्र यहां पुनः पधारे थे। आचार्य जिनपति सूरि की मृत्यु के बाद सन् 1221 ई- में श्री जिनेश्वर सूरि को यहीं ‘आचार्य‘ पद से अलंकृत किया Ûया था। इन जैन आचार्यों }ारा आयोजित उत्सवों में आस-पड़ोस की श्र)ालु जनता पूरी निष्ठा से भाÛ लेती थी।

यहीं उद्योतन सूरि ने वीरभद्र और हरिभद्र के निर्देशन में ‘कुवलयमाला‘ की रचना की थी। सन् 953 ई- में हरिभद्र सूरि के ‘अष्टकसंÛ्रह‘ पर जिनेश्वर सूरि ने टीका लिखी थी। जिनेश्वर सूरि के भाई बु)िसाÛर ने यहीं अपना Û्रंथ ‘पंचÛ्रंथी व्याकर.ा‘ की रचना की थी। प्रसि) वि}ान अससिÛा ने यहीं सन् 1200ई- में ‘जीवदया रास‘ और ‘चंदनबालारास‘ की रचना की थी। जालौर में ही लिखी।

सम्राट उदयसिंह का मं=ी यशोवीर ,क उद्भट वि}ान तथा प्रसि) कवि हुआ, जिसकी तुलना सोमेश्वर सूरि ने ‘कीर्ति कौमुदी‘ में अभिनन्द, मा?ा और कालीदास से की है। चैदहवीं शताब्दी में जिनभद्र सूरि ने यहां ,क विशाल ‘शास्=ा-भंडार‘ की स्थापना की थी। मध्यकाल में जितने भी जैन वि}ान हु, हैं, उन लोÛों ने इस शास्=ाभंडार से सहायता ली थी। सन् 1510 ई- में यहीं धर्मसमुद्र Û.िा ने ‘सुमि=ा कुमार रास‘ की रचना की थी। सन् 1582 ई- में सारंÛ ने ‘कवि विल्ह.ा पंचाशिका चैपाई‘ सन् 1594 ई- में ‘भोज प्रबन्ध चैपाई‘ और सन् 1618 ई- में ‘भावषट=िविंशिका‘ की रचना यहीं की थी। सन् 1612 ई- में श्यामसुन्दर ने ‘वृत्तिरत्नाकर-वृत्ति‘ सन् 1678 ई- में धर्मवर्धन ‘परिहंबंतिसि‘ और ‘अ{ारबतीसी‘ की रचना यहीं की थी। अठारहवीं शताब्दी में कुमार चन्द ने ‘रोहि.ाी चैपाई‘ और तिलक चन्द्र ने अपनी रम्य रचना ‘देसि-परदेसी-चैपाई‘ यहीं पर लिखी थी।

तेरहवीं शताब्दी में जालौर का वैभव अपने चरम बिन्दु पर पहुंचा हुआ था। उसी काल में महेन्द्र प्रभू सूरि }ारा रचित ‘अष्ठतोत्तरि तीर्थमाला‘ के अनुसार वहां 99 लाख की सम्पत्ति वाले सेठों को भी रहने का स्थान प्राप्त नहीं होता था। यद्यपि इस कथन में अतिशयोक्ति है, परन्तु यह सत्य है, कि उस काल में इसका वैभव बहुत बढा चढ़ा था। जिनहर्ष Û.िा कृत वस्तुपाल चरि=ा (प्रस्ताव 2) में जालौर को मरूस्थली के भाल स्थल पर सुशोभित तिलक की उपमा दी Ûई है -
इति मरूस्थली भालस्थली तिलक सन्निभै।
जावालिनÛरे स्र्व.ाÛिरि श्रृंÛार कारि.ाी।।
‘कान्हड़ दे प्रबन्ध‘ में भी पद्मनाथ ने जालौर का विस्तृत और रोचक र्व.ान किया है।

वि-सं- 1512 में रचित ‘कान्हड़ दे प्रबन्ध‘ का महाकवि पद्मनाभ भी वीरमदेव के जन्म की सूचना नहीं देता है। अपना महान Û्रन्थ आरंभ करते हु, पद्मनाभ वीरमदेव का परिचय देते हु, सिर्फ इतना ही कहते हैं, कि -

कुंअर वीरम दे बली, जा.ो जÛि जयवंत।

,ेतिहासिक दृष्टि से महत्वर्पू.ा बांकीदास की ख्यात में वीरमदेव को कान्हड़ देव का बेटा कहकर पुकारा Ûया है।

‘कान्हड़ दे प्रबन्ध‘ के अनुसार, कान्हड़ दे, चार रानियों के पति थे-उमा दे, कमला देवी, जैतल दे और भावल देवी।

माॅं कमला देवी ‘भटिया.ाी‘ ?

अÛर हम, ‘वीरम दे सोनीÛरा की बात‘ के कुछ अंश का ,ेतिहासिक उपयोÛ करना चाहें, तो उमा दे उसकी माता नहीं हो सकती, क्योंकि वार्ता के अनुसार पहली रानी (अÛर पद्मनाभ की सूची वरिष्ठता क्रम से जारी की Ûई हो) के पेट से सिर्फ ,क मा= पु=ी को जन्म दिया था, जिसका नाम, वार्ता के अनुसार वीर मती था।

वीरमदेव दूसरी रानी से पैदा हुये थे, जिसका नाम सम्भवत कमलादेवी था, जो निम्न प्रसि) दोहे -

‘मामा लाजे भाटियां, कुळ लाजे चहुवां.ा।‘

के अनुसार भाटी राजवंश की थी।

उपर्युक्त दोहे का कथन न सिर्फ, उनकी माता के वंश का परिचय देता है, बल्कि ‘वार्ता‘ के अनैतिहासिक जन्म की कथा को भी निस्सार कर देता है।

शिलालेख भले ही इतिहास के मेरूद.ड हैं, पर उसकी मांस मज्जा तो अनुश्रुतियाँ और लोकोक्त्तियाँ ही होती है।

कान्हड़ देव ने मुसलमान सैनिकों }ारा अपवि= किये Ûये, उन शिव लिंÛों को ÛंÛा जल से प्र{ाालन कर पवि= करवाया और उसमें से ,क ख.ड प्रभास पट्टन के उसी मन्दिर में, दूसरा ख.ड बाÛड़ तीसरा आबू, चैथा जालौर और पांचवां ख.ड अपने उपवन में मन्दिर बनवा कर उसमें प्रतिष्ठित करवाया। समस्त हिन्दुओं की दृष्टि में शिवलिंÛ की मुक्ति का यह कार्य कान्हड़देव की महान उपलब्धि थी।
काया अमर न कोय, थिर माया थोड़ी रहे।
दुनि में बातां दोय, नामां कामां, नोपला।।
कि वत्था धन जोड़ियां, नह चलसी सत्थांह।
मरदां अत्थां मा.िायां, जुÛ रहसी कत्थांह।।

उस दिन अमावस भी थी, इसलि, धार्मिक आस्था के अतिरिक्त लड़े Ûये यु) की थकान मिटाने तथा शरीर पर खून के दाÛ मिटाने के लि, बहुसंख्यक राजपूत अंÛ, जिरहजी.ा और कपड़े उतारकर सरोवर में स्नान करने लÛे। उनमें से ही कोई तुर्की सेना के छीने हु, निशानों को उल्लासपूर्वक बजाने लÛा। उसको अपने मूर्खतार्पू.ा कृत्य से उपजे Ûम्भीर परि.ाामों का अंदाज नहीं था। हुआ यह कि मलिक नायब जो शिकार से अपने खेमे की ओर लौट रहा था, उसने सोचा कि शायद ये निशान उसके बुलाये जाने के लि, ही लÛातार बजा, जा रहे हैं और वह अपने सैनिकों के साथ वहाँ जा पहुंचा, जहाँ नÛाड़े बजा, जा रहे थे। वह बड़ी तेजी से अपने खेमे को लौटा। उस समय उसके साथ 6 हजार ?ाुड़सवार और 30 हाथी थे। उसने वहाॅं मुस्लिम खेमों को ध्वस्त ,वं असंख्य मुसलमानों को मरा हुआ पाया। ?ाोडे़-हाथी, अस्=-शस्=, रसद, कपड़े, बहुमूल्य वस्तु,ं सब नदारद। उसे समझते देर न लÛी कि यहां क्या हुआ है? निकट ही वह देखता है कि ,ेसा खूनी कारनामा अंजाम देने वाले लोÛ तालाब में खुशियां मनाते हु, नहा रहे हैं। फिर क्या था? मलिक की सेना ने तालाब को चारों ओर से ?ोर कर अचानक अप्रत्याशित आक्रम.ा कर दिया। देखते ही देखते निहत्थे राजपूत तड़प-तड़प कर पानी में डूबने लÛे। कुछ राजपूत पानी से बाहर निकलने के प्रयस में, कुछ पानी से बाहर निकल कर अपने ?ाोड़ों पर चढने के प्रयासे में मारे जा रहे थे। हजारों बा.ाों से बिंधे लाखन सेभट, साल्ह शोभित और अजयसी माल्ह.ा अपने-अपने ?ाोड़ों पर चढ़ने में सफल हो Û,।

नंÛे बदन निःशस्= वीर मृत्यु का आमं=.ा स्वीकार करते हु, तुर्कों पर टूट पड़ना चाहते थे-------- लेकिन जैसे पत्थर तोड़ने वाले हाथ फूलों को मसल देते हैं, वैसे ही प्रतिरोध से भरे हु, तुर्कों ने आनन-फानन में उन्हें मार Ûिराया।

जीवन की यह नाटिका कितनी विचि= है। {ा.ा भर पहले जहाँ उल्लास मनाया जा रहा था, पट परिवर्तन होते वहाँ शमशान का भयावह दृश्य मंच पर उपस्थित है लाल पानी से भरे सरोवर के चारों तरफ चार हजार राजपूतों के {ात-वि{ात पार्थिव शरीर बिखरे पड़े हैं। वहां न कोई Ûाने वाला है, न रोने वाला।

अपने अश्व से मलिक नायब उतर पड़ता है। वह लाखन साल्ह अजयसी के मृत शरीर के पास पहुंच कर अपने अंÛूठे से उनके Ûरम रक्त का अपने माथे पर तिलक लÛाता है -

“धन्य है तुम्हारी माँ। तुम जैसे वीर न तो हिन्दू सेना में है, न तुर्क सेना में। तुम लोÛों को सलाम।”

यह ,क मुसलमान का हिन्दू के प्रति सम्मान नहीं, ,क वीर की ,क वीर के प्रति सच्ची श्र)ांजलि है।

“कनचयाल(कनकाचल, सुर्व.ा Ûिरि अथवा जालौर) सारे विश्व में मशहूर हैं प्राचीन काल में यहाँ कभी जाबालि ऋषि का आश्रम हुआ करता था, इसलि, इसका नाम जाबालिपुर प्रसि) हुआ। यह सत्य है, कि हिन्दुस्तान में बहुत से मजबूत दुर्Û है, जैसे-आसेर, ग्वालियर, चि=कुट चम्पानेर, भाम्भेर, मांडवÛढ़, सालेर, मूलेर-मÛर कोई भी दुर्Û जालौर दुर्Û की सुदृढता और दुरूहता में उसका मुकाबला नहीं कर सकता।
दुर्Û की तलहटी में बसे हु, नÛर के निवासियों के बारे में क्या कहा जाय, यहाँं के ब्राह्म.ा, जो वेद, पुरा.ा, शास्=ों के अध्ययन के प्रति समर्पित हैं। वे अध्ययन के अतिरिक्त शास्=ार्थ करने में भी बहुत प्रवी.ा हैं। जालौर में 36 विभाÛों के {ा=िय निवास करते हैं, जो अपने शौर्य, साहस और वीरता के लि, प्रख्यात हैं। चैहान राजा कान्हड़दे के मन में स्=ियों, ब्राह्म.ाों और Ûायों के प्रति असीम श्र)ा है। 36 प्रकार के आयुध चलाने के निष्.ाात राजा कान्हड़ दे कभी तुच्छ कार्य करने के बारे में सोचता भी नहीं है।”

नीच, पतित वीका दहिया ने अपना काम कर दिया था। उधर कमालुदीन Ûुर्Û बड़ी तीव्रता से तुर्क सेना को दुर्Û में दाखिल करवा रहा था और इधर अपनी दुष्टता र्पू.ा करके वीका दहिया प्रफुल्लित मन से नाना प्रकार की सुखदायी कल्पना,ं संजोये हु,, यह शुभ संवाद अपनी पत्नी को सुनाने के लि, ?ार पहुंचने की जल्दी में था।
?ार पहुंचते ही उसने ,क सांस में वह सारा का.ड कह सुनाया। वीका सोचता था कि यह समाचार सुनकर उसकी पत्नी अत्यन्त प्रसन्न होÛी और फिर पति की उन्नति से किसकी पत्नी प्रसन्न नहीं होती है। लेकिन यह किसी व्यक्ति का उत्कर्ष नहीं था, आत्महत्या थी। पाप कर्म }ारा अर्जित यह वैभव किस काम का, जिस पर लोÛ थूकें, Ûालियां दें, श्राप दें। वह स्र्व.ा महल क्या होÛा, जो पास की बारूद के ढेर पर निर्मित किया Ûया हो। हीरां ,क {ा=िय ओज से पैदा हुई स्फुलिंÛ थी, जो पाप की हवा पाते ही प्रच.ड अग्नि बन Ûई, जो वीका के आसमान में तैरते पापी महल को जलाने के लि, लपलपा उठी।
{ा=ा.िायां भले ही अभावों में पलती रहीं हों, परन्तु उनका स्वप्न पुरूष ,क आदर्श {ा=िय हो, यहीं कामना और अभिलाषा सदैव उनके जीवन का मापद.ड रहा है। हीरा अपने सामने खड़े उस पतित पति को देख रही है जो कामी है, नीच है, देशद्रोही है, नरकÛामी है। वह नारी Ûुस्से से फट पड़ती है-
“अरे च.डाल! तूने यह क्या किया? अरे दुष्ट! ,ेसा करते समय तूने सोचा नहीं कि जो राजा ,क पिता की भांति हमारा पालन-पोष.ा कर रहा है, जिसने हमारी सुख-सुविधाओं का समुचित प्रबन्ध कर रखा है, उस राजा के प्रति इतना बडा विश्वास?ाात। अरे निर्लज्ज! तूने अपने लोभ के लि, इतना बड़ा दुष्कर्म कर डाला, जबकि सारे नाÛरिक इस दुर्Û की र{ाा में अपना खून-पसीना बहाते हु, रात-दिन कहते-कहते हीरां देवी का {ा=ियत्त्व पूरे उफान पर आ Ûया, आवेश से उसकी मुट्ठियां तन उठी। शरीर का सारा रक्त आंखों में समा Ûया। पापी हतप्रभ, अवाक हो नारी के च.डी रूप को देख रहा है। वह च.डी झपट कर =ंबालू (तांबे के खोल से निर्मित बड़ा ढोल) उठाकर पूरे वेÛ से उस राजद्रोही रा{ास के सिर पर प्रहार कर देती है। इस प्रकार से वीका की खोपड़ी फट पड़ती है। पाप का ?ाड़ा फूटते ही सारा रक्त फर्श पर फैल जाता है और उसका निर्जीव शरीर वहीं ढेर हो जाता है।
यह नारी, अपने पति का नहीं, देशद्रोही का खून करके बदहवास हो राजमहल की ओर दौड़ पड़ती है। Ûिरती पड़ती वह राजमहल में ?ाुसकर सीधे राजा कान्हड़दे के पास पहुंचती है। हांफते हु, वह कहती जाती है, “महाराजा जी! मुसलमानी सेना दुर्Û में प्रवेश कर रही है।”
इसी बीच दुर्Û में ?ाुसते हु, तुर्क सेना का कोलाहल और तुरही की आवाज राजा के कानों में भी पड़ने लÛी थी।

अपने प्रसि) वीरों को खोकर कान्हड़ दे ने अन्तिम र्नि.ाय लिया। इन्होनें अपने राजपुरोहित सोमचन्द्र व्यास को बुलवाया। चिन्तातुर राजा व्यास जी से बोले - “महाराज! आप देख रहे हैं कि मेरा भविष्य मेरे सामने नंÛा होकर नांच रहा है। मुझे तो अश्वशाला में बंधे चैबीस सौ अश्वों की चिन्ता हो रही है, मैं चाहता हुँ साह.ाी को आदेश दूं कि वे सारे अश्वों को मृत्यु के ?ााट उतार दे।”

“नहीं, नहीं, दानी र्क.ा की तरह, अपनी जीवन की अन्तिम ?ाड़ी में इन अश्वों का दान कर दो। मैं अपना हाथ फैला कर तुमसे द{िा.ाा की मांÛ कर रहा हुँ। व्यासजी Ûम्भीरता से बोले”

राजा ने तुरन्त व्यासजी का पाद प्र{ाालन करके ?ाोड़ों का दान कर दिया। ?ाोड़ों का दान करते समय राजा के मन में यह विचार था कि इन ?ाोड़ों को प्राप्त कर व्यास जी दुर्Û छोड देंÛे, परन्तु यह क्या? उन्होने यह कहते हु,, “ब्राह्म.ा के धन का जो अपहर.ा करेÛा, उसका नाश हो, सारे ?ाोड़ों को बन्धन मुक्त कर दिया।”

व्यासजी को ,ेसा करते देख राजा को बड़ा आश्चर्य हुआ, “क्या आप यह दुर्Û छोडकर नहीं जा रहे है? क्या आप भी मेरे साथ मरना चाहते है?”

राजा की यह बात सुनकर व्यास जी की आंखें डबडबा उठी।

“सौभाग्य है कि जजमान के हाथ से छूटा हुआ पुरोडास यज्ञ-कु.ड में ही Ûिरा। ओ राजा! तुम्हारे बाद वह कौन राजा है, जो मेरी पालकी को कंधा देÛा। मैं ब्राह्म.ा हूं। चा.डाल नहीं। जो राजा Ûाय, ब्राह्म.ाों की र{ाा के लि, अपना सर्वस्व होम कर रहा है, क्या उस राजा के साथ यह ब्राह्म.ा अपना प्रा.ा नहीं दे सकता। मैं भी बलि दूंÛा, तुम्हारे साथ इसी दुर्Û में।”

सारे रनिवास को {ा.ाभर में अग्नि ने लील लिया। स्वतं=ता के समर यज्ञ में सिर्फ रनिवास ने अपना बलिदान नहीं दिया था, ,ेसा अनुष्ठान जालौर नÛर में 1584 स्थानों पर आयोजित हुआ था। हम कल्पना कर सकते हैं उस दिन के आध्यात्मिक हाहाकार, विषाद क्रन्दन के बीच जाबालि ऋषि की इस साधना-स्थली का सीना टूक-टूक हो Ûया। जवाई नदी फफक-फफक कर रो पड़ी होÛी। स्वतं=ते, तुम्हें इस महनीय अनुष्ठान के अतिरिक्त और कौन सा बलिदान चाहि,?

,ेसा है अद्भुत अर्व.ानीय जालोर के वीरों की वीरता का इतिहास। जालोर वीरों, शूरों, सन्त-तपस्वियों की धरती है।

वीरमदेव चैकी

जालोर Ûढ़ ऊंचे पहाड़ के विशाल धरातल पर स्थित है जहां पर अनेक महल, मन्दिर, मस्जिद, झालरे आदि हैं। किले की दिवारें 25 फुट तक ऊंची और 15 फुट तक चैडी है। ?ाुमावदार परकोटे हैं परन्तु पर्वतों की सबसे ऊंची चोटी पर विशाल चबूतरे पर जहां ,क सौ व्यक्ति बैठकर मं=.ाा कर सकते हैं। ,क स्थान बनाया हुआ है। इस स्थान के बीच में ,क पलंÛ रखने का स्थान बनाया हुआ है। इस स्थान के बीच में ,क पलंÛ रखने का स्थान है जहां पलंÛ के चार पायों को अंदर रखने के लि, पत्थर-चूने से Ûढ्ढे बने हु, हैं जिससे तेज हवा होने पर भी खाट-पलंÛ उड़ न सकें। यहां अत्यन्त ही Ûुप्त मं=.ाा संभव हैं। इसी के साथ यहां से पूरे किले पर नजर रखी जा सकती है। आस पास का मनोहर दृश्य यहां से दृष्टि Ûोचर होता है।

स्र्व.ाÛिरि ,वं जैन समाज

स्र्व.ाÛिरि पर्वत पर स्थित प्राचीन जैन मन्दिरों की परम्परा ने इसे जैन तीर्थों में महत्वर्पू.ा स्थान दिया है। इसे राजस्थान के श=ुंजय तीर्थ की महिमा से मंडित किया Ûया है। आर्चाय धर्म?ाोष सूरि विरचित ‘मंÛल स्तो=‘ के आठवें श्लोक में कनकाचल नाम से इसे पवि= जैन तीर्थों में समाविष्ट किया है -

ख्यातोऽष्टापद-पर्वतो Ûजपदः सम्मेत-शैलाभिधः,
श्रीमान् रैवतकः प्रसि)-महिमा श=ुन्जयो मंडपः।
वैभारः कनकाचलोऽर्बुद-Ûिरिः श्री-चि=कूटादयः,
त= श्रीऋषभादयो जिनवराः कुर्वन्तु वो मंÛलम्।।

अर्थ: प्रसि) अष्टापद पर्वत, Ûजपद, सम्मेतशिखर, रैवताचल, Ûिरनार, महिमा-मंडित श=ुंजय, मांडवÛढ़, वैभारÛिरि, कनकाचल(कंचनÛिरि-स्र्व.ाÛिरि) अर्बुदÛिरि ,वं चि=कूट(चित्तौड़) आदि तीर्थों के स्वामी श्री आदि तीर्थकर ऋषभदेव तुम्हारा कल्या.ा करें।

इस परिम.डल के राजवंशों प्रतिहार, परमार चैहान ,वं राष्ट्रकूटों ने जैन धर्म का पोष.ा ,वं संर{ा.ा किया। इससे पूर्व हू.ा तोरमा.ड का भी इस प्रदेश पर शासन था। उसकी प्रशंसा उद्योतन सूरि ने अपनी प्रसि) रचना(778 ई-) कुवलयमाला में की है। तोरमा.ा जैन धर्म के प्रति आस्थावान था। उस युÛ में शक ,वं हू.ा प्रभृति विदेशी राजवंशों को जैन धर्म में मिलाने का कार्य आचार्य हरिभद्रसूरि ने किया। उन्होनें भीनमाल में कई विदेशियों को जैन बनाया। “ब्रह्मस्फुट सि)ांत” के रचयिता जिष्.ाु का पु= ब्रह्मÛुप्त भीनमाल का निवासी था ,वं वैश्य था। उसके ज्योतिष ज्ञान ,वं वि}ता का डंका सारे भारतवर्ष में बजता था। हमारे देश का यह दुर्भाग्य है कि हम लोÛ अपने लोÛों के महान कार्यो को भूल जाते हैं ,व विदेशियों के Ûु.ाÛान करने से नहीं अ?ााते। कुछ वर्षों पहले सूर्य सि)ान्त के आधुनिक प्रस्तोता कोपरनिकस की 400 वीं जयंती हमारे देश में मनाई Ûई पर सूर्य सि)ान्त के सातवीं शताब्दी के प्र.ोता ब्रह्मÛुप्त का सूर्य सि)ान्त और उसकी महत्ता हम भूल Ûये।

इस युÛ के जैन साहित्य “कुवलयमाला”(778 ई-) से ही ज्ञात होता है कि राष्ट्रकूटों से पराजित होकर वत्सराज ने अपनी राजधानी भीनमाल से बदल कर जालोर स्थापित की थी। इन्हीं प्रतिहारों ने भीनमाल के दुर्Û को अर{िात जानकारी स्र्व.ाÛिरि का यह वर्तमान दुर्Û स्थापित किया था। कथा साहित्य का चरम निदर्श ‘कुवलयमाला‘ जालोर में ही लिखी Ûई थी। इसमें भारतवर्ष की वर्तमान भाषाओं के पूर्वज शब्दस्वरूप अंÛडाई लेते दिखाई देते हैं। तत्कालीन जालोर परिम.डल का या यूं कहिये सम्र्पू.ा मरूम.डल का वानस्पतिक, सांस्कृतिक ,वं सामाजिक परिवेश ‘कुवलयमाला‘ में जीवंत दिखाई देता हैं। भीनमाल से Ûुजरात Ûये श्रीनन्न के वंशज विमलशाह ने ही देलवाड़ा के जÛत्प्रसि) विमलवसहि मन्दिर को बनवाया था -
श्री श्रीमाल कुलोत्थ निर्मलतर, प्राग्वाटवंशाम्भरे,
भ्राजत् शीतकरोपमो Ûु.ानिधिः श्री निन्नकाख्यो Ûृही।
आसीद् ध्वस्तसमस्त पापनिचयो, वित्तो वरिष्ठाशयः,
धन्यो धर्मनिब) शु)।। }िधिष.ाः स्वाम्नाय लोकाÛ्र.ाी।।

आचार्य जिनसेन सूरि ने 780 ई- में अपनी प्रसि) रचना हरिवंशपुरा.ा का प्र.ायन इसी {ो= में किया। वत्सराज का र्व.ान ल?ाुस्त्तव नामक Û्रन्थ में भी आता हैं। जिस पर सोमशेखर सूरी ने टीका की हैं।

पहली शताब्दी में भीनमाल में हु, पादलिप्तसूरि ने पालिताना तीर्थ की महिमा हेतु ‘श=ुंजय कल्प‘ की रचना की। जालोर में परमार राजा भोज के शासन के समय में प्रभाचन्द्र नामक जैनाचार्य ने “प्रमेयकमलार्त.ड” नामक दर्शन Û्रंथ लिखा। वीर नामक जैन वि}ान ने ‘जम्बुस्वामीचरित‘ तथा नेमिचंद्र ने “द्रव्यसंÛ्रहटीका” जालोर में लिखी। सं- 1254 के आसपास सिरोही के कासहृदÛच्छ के साथ ही जालोर Ûच्छ की स्थापना जालोर से हुई। इस Ûच्छ के बालचन्द्र, Ûु.ाभद्र, सर्वानन्द, धर्म?ाोष ,वं देवसूरि वि}ान साधु हुये। देवसूरि ने प्राकृत में पद्मप्रभ चरि= रचा। इसी Ûच्छ के जिनपति सूरि के शिष्य र्पू.ाभद्रसूरि ने पंचाख्यानक(पंचतं=) का संशोधन किया जिस पर इटली के वि}ान र्हअन मुग्य हुये थे।

भीनमाल का सं- 1333 आश्विन सुदि 14 सोमवार के लेख में महाराजा चाचिÛदेव चैहान के राज्य में भीनमाल के राज्याधिकारी सुभट ,वं कर्मचारी कर्मसिंह ने अपने कल्या.ा के लि, आश्विन मास की या=ा महोत्सव पर महावीर स्वामी को पंच प्रकारी पूजा के लि, काफी द्रव्य का दान किया था।

जालोर तथा राजेन्द्रसूरीश्वरजी

वि-सं- 1933(1877 ई-) में श्रीमद् विजय राजेन्द्र सूरीश्वरजी का वर्षवास स्र्व.ाÛिरि तीर्थ के इतिहास में ,क सुनहरा वृत्तान्त है। दुर्Ûस्थित जिन मन्दिरों का शस्=ाÛारों की भांति उपयोÛ देखकर आचार्यश्री ने उनके उ)ार का संकल्प लिया। निरंतर आठ माह के सत्याÛ्रह सं?ार्ष के पश्चात् उन्हें सफलता मिली ,वं तभी से स्र्व.ाÛिरि के जैन मन्दिरों की व्यवस्था =िस्तुतिक जैन समाज के पास है।

आचार्यश्री का जन्म 3 दिसम्बर 1827 ई- को भरतपुर में श्रेष्ठी ऋषभदास पारख के ?ार माता केसरबाई की रत्नकु{िा से हुआ था। उनका नाम रत्नराज था। जन्म से ही मेधावी ,वं स्वाध्याय-चिंतन में विशेष अभिरूचि थी। अपने बड़े भाई मा.िाकचंद के साथ व्यापार के लि, बंÛाल ,वं लंका तक Ûये। माता-पिता के देहांत के पश्चात् आत्मरम.ाता में लीन वैराग्य की ओर प्रवृत्त हु,। 1845-47 में भरतपुर में प्रमोदसूरि जी का आÛमन होता रहा ,वं रत्नराज उनके संपर्क में रहे। उन्हीं की आज्ञा से रत्नराज ने उदयपुर में प्रमोदसूरिजी के बड़े Ûुरू भ्राता यति हेमविजयजी ये यति दी{ाा ली। नामकर.ा हुआ रत्नविजय। वैराग्य संवर्धक प्रमोदसूरिजी के साथ अकोला(बरार) ,वं इंदौर में चातुर्मास किये। अध्ययनशील ,वं मेधावी रत्नविजयजी ने 1849 में उज्जैन में चातुर्मास, विहार आदि यति साÛरचंद्रजी के साथ किये ,वं उनसे व्याकर.ा, न्याय, कोष, काव्यालंकार आदि का विशिष्ट अध्ययन किया। तत्पश्चात् आपने मंदसौर, उदयपुर, नाÛौर आदि में चातुर्मास किये। इनकी विल{ा.ा प्रतिभा देखकर इन्हें उदयपुर में बड़ी दी{ाा दी Ûई। 1852 ई- में इन्हें पंन्यास पद भी दिया Ûया था। 1853 से 1862 तक इनके सिरोही, पाली ,वं जालोर परिमंडल के बाहर चातुर्मास हु,। 1857 से 1862 तक धर.ोन्द्रसूरिजी को कालन्द्री में उनके यति मंडल के साथ विद्याभ्यास करवाया। धर.ोन्द्रसूरिजी कालन्द्री में Ûादीपति थे ,वं उनका उपासरा कालन्द्री के पोरवालवास के नेमिनाथ मन्दिर के सामने है उसमें म.िाभद्रजी की प्राचीन स्थापना है।

1863 में आपने रतलाम में वर्षावास किया ,वं पुनः प्रमोदसूरिजी के साथ आहोर पधार Ûये। प्रमोदसूरिजी आहोर के Ûादीपति थे ,वं धर.ोन्द्रसूरिजी के Ûुरू भाई थे। इनके Ûुरू भाई की ,क Ûादी ?ाा.ोराव में भी थी। आपका चातुर्मास 1864 में अजमेर में हुआ। आपकी योग्यता देखकर धर.ोन्द्रसूरिजी ने आपको दफ्तरी नियुक्त किया। 1865 में आहोर में चातुर्मास किया ,वं यतिसंस्था के शिथिलाचार के प्रति आपके मन में विराÛ पैदा हुआ। आपने धर.ोन्द्रसूरिजी के }ारा प्रदत्त दफ्तरी पद का परित्याÛ कर दिया ,वं मन में यति समाज के शिथिलाचार के विरू) क्रियो)ार का संकल्प लिया।

जालोर तथा मुह.ाोत

मुÛल काल में स्र्व.ाÛिरि दुर्Û के जैन मन्दिरों के उ)ारक जालोर के देश दीवान मुह.ाोत जयमलजी के उपकारों को भूला नहीं जा सकता है। जयमलजी जोधपुर के राव चन्द्रसेन के दीवान मुह.ाोत अचलाजी के पौ= थे। अचलाजी जीवन भर राव चन्द्रसेन के साथ रहे उन्होंने संवत् 1635 श्राव.ा वदि 11 तदनुसार 31 जनवरी 1582 ई- में सवराड़ के यु) में वीरÛति पायी। वे उस समय राव चन्द्रसेन की तरफ से सोजत के मुÛलकालीन हाकिम सैयद हासिम से लड़ते हु, स्वर्Ûवासी हु,। सवराड़ में इनकी छ=ी बनी हुई है। इनके पु= जेसाजी ने अपने पु= जयमलजी ,वं पौ=ों के साथ वि-सं- 1683 में जालोर किले पर धर्मनाथ के बिम्ब की स्थापना की थी। जयमलजी इन्हीं जेसाजी के पु= थे। इनका जन्म वि-सं- 1638 मा?ा सुदि 9 बुधवार तदनुसार दिनांक 31 जनवरी 1582 को हुआ था। इनकी माता का नाम जयवन्तदे था। इनकी प्रथम पत्नी वेदमुहता सरूपदे से तीन पु= नै.ासी, सुन्दरसी व आसकर.ा हु,। नै.ासी राजस्थान के प्रथम इतिहासकार माने जाते हैं। इनकी दूसरी पत्नी सिं?ावी सुहाÛदे से नृसिंहदास का जन्म हुआ।

जयमलजी नीतिनिपु.ा और कर्तव्यनिष्ठ राजनीतिज्ञ थे। इनकी धर्मनिष्ठा ,वं वीरता मारवाड़ में प्रसि) थी। इनके Ûु.ाों से प्रभावित होकर महाराजा सूरसिंहजी ने इन्हें Ûुजरात के वड़नÛर का हाकिम नियुक्त किया था। सूरसिंहजी का अधिकार जब फलौदी पर हो Ûया तो इन्हें फलौदी का हाकिम बनाया Ûया। संवत् 1677 के वैशाख मास में महाराजा Ûजसिंहजी जोधपुर के महाराजा बने। उन्होंने जयमलजी को जालोर का शासक नियुक्त किया। जब उन्हें शाहजादा खुर्रम ने सांचोर का परÛना प्रदान किया तो जयमलजी जालोर ,वं सांचोर दोनों परÛनों के दीवान नियुक्त हु,।

जयमलजी जैन श्वेताम्बर मूर्तिपूजक ओसवाल थे। उन्होंने अपनी जालोर की दीवानी के दौरान जालोर दुर्Û के भग्न मंदिरों को देखा तो उनकी पीड़ा को समझकर उनका र्जी.ाो)ार करने की प्रेर.ाा तपाÛच्छचार्य विजयदेवसूरि ने दी। आचार्य विजयदेवसूरिजी का सम्बन्ध बादशाह जंहाÛीर के दरबार से था। बादशाह जंहाÛीर ने उन्हें वृहत्तपा की उपाधि दी थी। जयमलजी ने जालोर दुर्Û के भग्न य{ावसति, अष्टापद ,वं कुमारविहार मंदिरों का र्जी.ाो)ार करवाया। भग्न जिन प्रतिमाओं को पधराया Ûया ,वं कुछ नये बिम्ब भरवाये Ûये। इनकी प्रतिष्ठा आचार्य विजयसूरि ने की। जयमलजी के इस महान् योÛदान को चिरस्थायी करने के लिये उनके परिवार ने जयमलजी की हाथी पर सवार प्रतिमा य{ावसति (महावीर मंदिरों) में स्थापित की, जैसा कि मंदिरों के शिलालेखों में र्व.िात है।

स्र्व.ाÛिरि दुर्Û के मन्दिरों की प्रतिष्ठा के पश्चात आपने संवत् 1683 में श=ुंजय पर ,क जैन मन्दिर बनवाया। इन्होंने अपने परिवार के साथ श=ुंजय आबू ,वं Ûिरनार तीर्थों की सं?ाया=ाओं का आयोजन किया। अपनी धर्मनिष्ठा के कार.ा जयमलजी ने मेड़ता, सिवाना ,वं फलौदी आदि नÛरों में जैन मन्दिरों के लि, महत्वर्पू.ा योÛ दिया ,वं उपाश्रय बनवाये। जयमलजी }ारा जोधपुर में चैमुखा केसरियाजी मन्दिर बनवाये जाने की हकीकत ओसवाल जाति के इतिहास में र्व.िात है किन्तु जोधपुर में केसरियाजी का मन्दिर तो है पर कोई चैमुखा मन्दिर आज दिखायी नहीं देता। नाडोल से प्राप्त सन् 1629 के राय विहार पद्मप्रभुजी के मन्दिर में पद्मप्रभु के बिम्ब पर उत्र्की.ा लेख मं जयमलजी का नाम बड़े सम्मान से लिया Ûया है।

राजाधिराज श्री Ûजसिंह प्रदत्त सकल राज्य व्यापाराधिकारे.ा म- जैसा सुत जयमल।

इस लेख से यह पता चलता हैं कि इन्हें महाराजा Ûजसिंह जी प्रथम ने सारे मारवाड़ में व्यापारिक आदान-प्रदान व व्यवस्था के अधिकार दिये थे।

सिरे मन्दिर

जालोर नÛर के द{िा.ा में दो पहाड़ स्थित हैं। पहला कनकÛिरि अथवा कनकाचल है जिसे स्र्व.ाÛिरि भी कहते हैं इस पहाड़ पर जालोर दुर्Û स्थित है। इस पहाड़ में पास ही द{िा.ा पश्चिम दिशा में स्थित दूसरा पहाड़ कन्याÛिरि, कनयाचल तथा कलशाचल कहलाता है। नÛर से लÛभÛ दो किलोमीटर दूरी पर स्थित यह पहाड़ दो हजार फीट की ऊंचाई का है जिस पर सिरे मन्दिर स्थित है। यह पर्वत अपनी विपुल प्राकृतिक सम्पदा झरने बालुका स्तूप तथा वनावली के कार.ा विविध दृश्य धार.ा करता है। यह स्थान योÛीराज जलंधरनाथ जी की सि) तपोभूमि है। जिनके नाम पर जालोर को जालंधर कहा जाता है।

जलंधरनाथजी ने यहां स्थित भंवर Ûुफा में तपस्या की और तात्कालीन परमार राजा राव को वटवृ{ा के नीचे तपोबल का चमत्कार दिखाया। राजा रतनसिंह ने वहां ,क शिव मन्दिर की स्थापना करवाई जिसे आज भी रत्नेश्वर महादेव के नाम से जाना जाता है।

मानसिंह राठौड़ ने आयस देवनाथ की कृपा से श्र)ालु होकर इस मन्दिर का पुननिर्मा.ा करवाया जो लÛभÛ 16-17 साल चला। मन्दिर परिसर में झालरा, चन्दर कूप, सूर्य कु.ड, अख.ड धू.ाा, हस्ति प्रतिमा, अमृत वाचिका, मानसिंह }ारा निर्मित तीन मंजिले भवन, जनाना व मर्दाना महल, भूल भुलैया आदि स्थित हैं।

भंवर Ûुफा के प्रांÛ.ा में बाई ओर ढाई फीट ऊंचे 15 फीट लम्बे व 24 फीट चैडे संÛमरमर के चबूतरे पर नाथ महात्माओं की समाधियां बनी हैं। ,क कोने पर सर्वप्रथम बनी हुई समाधि श्री सुआनाथजी की है। इस पर संÛमरमर का ,क तोता तथा ,क छोटा सा शिवलिंÛ बना है। इनके बाद भवानीनाथजी, भैरूनाथजी, हंसनाथजी, फूलनाथजी, सेवानाथजी, पू.ानाथजी, केसरनाथजी ,वम् भोलानाथजी की समाधियां है। कुछ समाधियों पर किसी का भी नाम अंकित नहीं है।

मन्दिर की सुर{ाा के लिये 105 फीट चैड़ा तथा 175 फीट लम्बा परकोटा बना हुआ है जिसकी ऊंचाई 10 फीट से 25 फीट तक है। परकोटे में पूर्व, उत्तर तथा पश्चिम दिशाओं में ,क-,क विशाल }ार बने हु, है। परकोटे की दीवार को पर्याप्त चैड़ा व सुदृढ़ बनाया Ûया है जो आपातकाल में मन्दिर को ,क ल?ाु किले में परिवर्तित करने में समर्थ थ। जोधपुर के महाराजा मानसिंह ने अपने निर्वासन का काल जालोर दुर्Û तथा इसी मन्दिर में Ûुजारा था। आÛन्तुकों की सुविधा के लिये परिसर में खुले बरामदे, बन्द कमरे तथा रसोई?ार आदि की पर्याप्त व्यवस्था है।

सिरे मन्दिर के लिये जहां से चढ़ाई आरम्भ होती है उससे कुछ पहले रतन कूप के अवशेष मिलते हैं, कहा जाता है कि यह कुंआ राव रतनसिंह ने बनवाया था। चढ़ाई आरम्भ होने के स्थान पर मानसिंह }ारा स्थापित जालंधरनाथ के चर.ा युÛल स्थित है। यहां या=ियों के विश्राम हेतु ,क विश्रामालय, ,क कुआं, ,क टांका तथा प्याऊ भी बनी हुई है। इन सबको ,क परकोटे से ?ारे दिया Ûया है जिसके बाहर बाईं ओर श्री रामेश्वरजी तथा श्री Ûोपीनाथजी कुलिया.ाा तथा दाईं ओर बालकनाथ जी और बाईसा भूरनाथजी(केसरनाथजी की शिष्या) की समाधियां बनी थी। ऊपर तक जाने के लिये पक्की सीढ़िया बनी हुई है। कुछ चढाई के बाद भैरूजी, टेकरी वाले हनुमानजी तथा उससे आÛे लÛभÛ आधे मार्Û पर Û.ोशजी के स्थान आते है। यहां Û.ोशजी की दो प्रतिमां, स्थापित है। ,क प्रतिमा राजा मानसिंह }ारा स्थापित की Ûई थी किन्तु कुछ वर्ष पूर्व यह Û.ोश प्रतिमा Ûुम हो Ûई। अतः ,क नवीन प्रतिमा स्थापित कर दी Ûई। बाद में प्राचीन प्रतिमा Ûुम हो Ûई। अतः ,क प्राचीन प्रतिमा स्थापित कर दी Ûई। बाद में प्राचीन प्रतिमा पुनः प्राप्त होने पर भी स्थापित कर दी Ûई।

आÛे के मार्Û में ,क छोटी सी समाधि बनी हुई है जो किसी ब्राह्म.ा देवता की है। कहा जाता है कि यहां किसी ब्राह्म.ा को शेर ने मार दिया था, जिनकी स्मृति में यह समाधि बनाई Ûई। आज भी सिरे मन्छिर की चढ़ाई करते व लौटते समय ब्राह्म.ा समुदाय के लोÛ ‘पाय लाÛूं सा‘ तथा ‘पाछो जाऊं सा‘ (चर.ा स्पर्श करता हूॅ तथा पुनः लौटता हूॅ) कहते है।

14 टिप्‍पणियां:

  1. आलेख निश्चित ही ज्ञानवर्धक है मगर इसमें फांट संबंधी या कम्पोजिंग संबंधी चूक साफ नज़र आ रही है जिसकी वजह से यह पढ़ने में दुरूह है। कृपया इसे ठीक कर दोबारा पब्लिश करें ताकि इसका आनंद लिया जा सकें। अभी पूरा नहीं पढ़ पाया हूं।

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  2. vyas ji aap mere blog par aaye va mere samarthak bane,iske liye dhanywaad.aapka lekh padha.achchha hai parntoo jaisa ajit ji ne kaha hai ki isko dobaara likho mai unki baat ka samarthan karta hoon .

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  3. pai lagusa aakpke dwara kiya ja raha kam vakai me jalor ki janta ke liye ak anupam tohpa hai

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  4. हुकम इतिहास मे गलतिया खुब है
    दहिया वंशीय क्षत्रिय राजपुतो ने 4 चोथी शताब्दी मे जालोर पर राज किया है चार पोलो मे सूरज पोल दहियो कि होना प्रमाणित है

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  5. आलेख निश्चित ही ज्ञानवर्धक है मगर इसमें फांट संबंधी या कम्पोजिंग संबंधी चूक साफ नज़र आ रही है जिसकी वजह से यह पढ़ने में दुरूह है। कृपया इसे ठीक कर दोबारा पब्लिश करें ताकि इसका आनंद लिया जा सकें। अभी पूरा नहीं पढ़ पाया हूं।

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